कितने धागों में ..जो ये जान पाती तो बाँध लेती तुम्हे ..जाने नहीं देती

तुम कहते हो की मन का कोई ओर कोई छोर नहीं होता ..फिर क्योँ !
मेरा मन ! तुम्ही पर  रुक जाना चाहता है ..क्योँ सिमट जाना चाहता हे तुम्ही में . .
जानते हो !तुमसे दूर जाने के लिए रोज कितने जतन करने पड़ते हैं इस मन को ..हर एक रोज
मीलों . .तक का . .तन्हा  सफ़र तय करना पड़ता है  ..

तुम मिलते तो हो मगर फिर से तन्हा कर जाने के लिए ..

और हर रोज फिर से उन्ही अ न गि न त तारों की बरात चली आती हे मन को छलने. . .
में बहलाने लगती हूँ . .खुद को . .मगर मन हे की मानता ही नहीं ..शोर मचाता है  ..अह्नाद करता है  .. …
कितना नादां ..कितना कोमल है .. बहोत मासूम  है . . सब जानता हे मगर फिर भी इंतज़ार करता हे . .तु म्हा रा
अपने ही खवाबों को भिगोता हे फिर..मगर चाँद की चाहत है की कभी पूरी ही नहीं होती
चांदनी रात फिर अधूरी  रह जाती है  .. हर बार की तरह और चंचल मन है की मानता ही नहीं. .



और मैं !. .उस बागी मन से हार जाती हूँ . . हर एक बार . .जो केवल तुम्हे चाहने के लिए ही बना है  ..
जिसे केवल प्यार की ही भाषा समझ आती है  . .जो और कुछ सुनना ही नहीं चाहता  . .
तुमसे आगे . .कुछ समझना ही नहीं चाहता . .

तुम्ही समझा दो ना ! उसे !!
तुम्ही आ जाओ एक बार ..समझा दो इस मन को ..
तुम्हारा ही तो है  . .तुम्हारा अपना ..मैं  तो हार गयी हूँ . .मगर तुम जीत जाओ . .शायद . . .!
Chandrakanta

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  • चन्द्रकांता जी बहुत की मार्किक शब्दों से अपने लेखन को बढ़ाया है... बेहतर लगा इसे पढ़कर.. आपको बधाई...

  • इस कविता में प्रेम अशरीरी है भोगवादी नहीं ,,,,
    यहाँ प्रेम में उपलब्धि की चाह नहीं बल्कि समर्पण का भाव है .....बहुत खूब चंद्रकांता जी .....

  • यह अभिव्यक्ति हमारे भी मन के बेहद करीब है दोस्त..

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